ये रात का नशा है या बात का
या फिर हमारी उस मुलाक़ात का
जब तुम तो थे पर हम नहीं
सारी वो यादें बुनती हुई
कुछ अटक गया था सीने में
कब से खटक रहा था जीने में
जब तुम न थे और हम तनहा कहीं
झ्हल्कियां यूँ ही दिखती हुई
भांगू किधर , तेरी नज़र है
भांगू भी क्यूँ, जब तू ही इधर है
जब तुम होते तो मंजिल होती यहीं
पर अब रस्ता मिला है और ज़िन्दगी नयी
Sunday, January 31, 2010
Subscribe to:
Comments (Atom)