Monday, March 29, 2010

सादगी थी
खूबसूरती नहीं
याराना था
आवारगी नहीं
कसक  थी
सिसकियाँ नहीं
दीवानापन था
दिवानगी नहीं
मोहब्बत तो थी
पर  बदनामी नहीं
बटी हुई दो तरफ
किस किनारे पे भरोसा करे
तभी दौड़ती हुई
शायद समुन्दर को मिलती है
धड़कन सुनाई क्यों सुनाई दे रही
शायद दिल अब तक यहीं है
कोशिश तो बार बार कि है
पर दम निकलता ही नहीं है

Tuesday, February 23, 2010

वो ही एक लम्हा था
जब तुम्हे करीब पाया था
ढूँढ रही हूँ आज तक
उस एहसास का एक कतरा

आँखें क्यों झूठ बोल गयी
या फिर दिखा वही जो  देखना  चाहती थी
इल्म हो रहा है अब
की वो नज़रें मिलाके चुराते क्यों नहीं

दूरी से कोई शिक्वा ही नहीं
क्यूंकि पास वो कभी थे ही नहीं
खता सिर्फ इतनी हुई
कि महक को महबूब समझती रही

Sunday, January 31, 2010

ये रात का नशा है या बात का
या फिर हमारी उस मुलाक़ात का
जब तुम तो थे पर हम नहीं
सारी वो यादें बुनती हुई
कुछ अटक गया था सीने में
कब से खटक रहा था जीने में
जब तुम न थे और हम तनहा कहीं
झ्हल्कियां यूँ ही दिखती हुई
भांगू किधर , तेरी नज़र है
भांगू भी क्यूँ, जब तू ही इधर है
जब तुम होते तो मंजिल होती यहीं
पर अब रस्ता मिला है और ज़िन्दगी नयी

Saturday, October 31, 2009

 dedicated to my friends at NID.....especially to pondy group...

आवारगी है , याराना है
हमारी महफ़िल ही ज़माना है
रौनक तो बसी है बन्दगी में
और चाहा ही क्या जिंदिगी में

क्यूँ मोड़ ऐसा आ गया, जहाँ से कोई " u turn" नहीं
काश हर दम रस्ता भूलें , और हर बार मुलाकात वहीँ

दीवानगी है , पैमाना है
बूँद बूँद का यहाँ ठिकाना है
हसरत इतनी नशा बढ़ता जाए
बरकत होती रहे पर हम न जाएँ

Tuesday, October 6, 2009

कुछ रोकता है तुम्हारे पास जाने से
कोई टोकता है तुम्हारे करीब आने पे
दिवानगी इस हद तक है
छलक न जाए तुम्हारे टकराने से

बोल दूँ गर तो कुछ कम न हो जाए
पी लूँ गर तो नशा बढ़ता ही जाए
आशिकी तो फ़लक तक है
अधर का मज़ा चरस्ता ही जाए

हसीं नजारों में एहसास और गहरा हुआ
आज़ादी की चाहत में दिल पे पहरा हुआ
आवारगी तो सनक तक है
भागूँ ख़ुद से कैसे, वो पल है यूँ ही ठहरा हुआ