Monday, July 5, 2010

एक नुमाइश बाकी है
वो आज़माइश बाकी है
जब हर हरकत नज़र में हो
जब साँसे भी समर में हो

एक फरमाइश बाकी है
वो  आराइश बाकी है
जब मुस्कराहट की कमी हो
जब हर शब्द में सिर्फ हँसी हो

एक ख्वाहिश बाकी है
वो बारिश बाकी है
जब ये ज़ुल्फ़ें भीगी  हों
जब हर बूँद गीली हो 

Wednesday, June 30, 2010

आँखों में चमक दिख जाती है
जब किसी के करीब होते हो
नज़रें ही पलट जाती हैं
जब हमसे मुख़ातिब होते हो

आवाज़ कि गहराई में नशा छा जाता है
उसके के लिए धुन जब बजाते  हो
साज़ का आगाज़ ही नहीं हो पाता
हमारे सामने जब भी आते  हो

ख़्वाबों कि दुनिया रंग जाती है
तस्वीर उसकी जब बनाते हो
एक लकीर भी बार बार बिगड़ जाती है
हमारी जुल्फें भी जब सँवारते हो

पर यकीन है हमे
कि हम कुछ ख़ास ही है
जिससे मिलके
सारे होश गँवाते हो
बोल दूँ अगर
जा रही हूँ मैं
पूछोगे क्या तुम
जाना ज़रूरी है

बोल दूँ अगर
खुश हूँ मैं
सोचोगे क्या तुम
किसकी खुमारी है

बोल दूँ अगर
जी रही हूँ मैं
समझोगे क्या तुम
कि धड़कन तुम्हारी है

Wednesday, June 16, 2010

कुछ अधूरी कहानियाँ
कुछ अनकहे किस्से
कुछ बिखरी ख्वाहिशें
कुछ भूले सपने

कुछ मनचली जिंदिगी
कुछ बेईमान हसरतें
कुछ बार बार गलतियां
कुछ कच्चे रस्ते

कुछ मीठी यादें
कुछ दिल कि बातें
कुछ महकती हवाएं
शायद कुछ ......अदाएं

Monday, May 17, 2010

टुकड़ों में जिए जा रहे हैं
खुद को गिने जा रहे हैं
हिम्मत नहीं खुद को पाने की
दूसरों को पाने की कोशिश किये जा रहे हैं

तमन्ना की भी तमन्ना नहीं
मुकम्मल होते देख डरे जा रहे हैं
ढूँढ़ते हैं बहाने हर वक़्त युहीं
खुशियों को नज़र लगाये जा रहे हैं

शिकवे तो  उनसे भी नहीं
जिनकी बदौलत पिए जा रहे हैं
ज़िन्दगी ने इख्तियार इतने दिए
कि रफ़्तार को रुकावट दिए जा रहे हैं

Monday, March 29, 2010

सादगी थी
खूबसूरती नहीं
याराना था
आवारगी नहीं
कसक  थी
सिसकियाँ नहीं
दीवानापन था
दिवानगी नहीं
मोहब्बत तो थी
पर  बदनामी नहीं
बटी हुई दो तरफ
किस किनारे पे भरोसा करे
तभी दौड़ती हुई
शायद समुन्दर को मिलती है
धड़कन सुनाई क्यों सुनाई दे रही
शायद दिल अब तक यहीं है
कोशिश तो बार बार कि है
पर दम निकलता ही नहीं है

Tuesday, February 23, 2010

वो ही एक लम्हा था
जब तुम्हे करीब पाया था
ढूँढ रही हूँ आज तक
उस एहसास का एक कतरा

आँखें क्यों झूठ बोल गयी
या फिर दिखा वही जो  देखना  चाहती थी
इल्म हो रहा है अब
की वो नज़रें मिलाके चुराते क्यों नहीं

दूरी से कोई शिक्वा ही नहीं
क्यूंकि पास वो कभी थे ही नहीं
खता सिर्फ इतनी हुई
कि महक को महबूब समझती रही

Sunday, January 31, 2010

ये रात का नशा है या बात का
या फिर हमारी उस मुलाक़ात का
जब तुम तो थे पर हम नहीं
सारी वो यादें बुनती हुई
कुछ अटक गया था सीने में
कब से खटक रहा था जीने में
जब तुम न थे और हम तनहा कहीं
झ्हल्कियां यूँ ही दिखती हुई
भांगू किधर , तेरी नज़र है
भांगू भी क्यूँ, जब तू ही इधर है
जब तुम होते तो मंजिल होती यहीं
पर अब रस्ता मिला है और ज़िन्दगी नयी