टुकड़ों में जिए जा रहे हैं
खुद को गिने जा रहे हैं
हिम्मत नहीं खुद को पाने की
दूसरों को पाने की कोशिश किये जा रहे हैं
तमन्ना की भी तमन्ना नहीं
मुकम्मल होते देख डरे जा रहे हैं
ढूँढ़ते हैं बहाने हर वक़्त युहीं
खुशियों को नज़र लगाये जा रहे हैं
शिकवे तो उनसे भी नहीं
जिनकी बदौलत पिए जा रहे हैं
ज़िन्दगी ने इख्तियार इतने दिए
कि रफ़्तार को रुकावट दिए जा रहे हैं
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वाह! बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
ReplyDeleteसुन्दर रचना ।
ReplyDeleteआप मेरे आप ब्लोग पर आये और दो शब्द कहे ।
http://photographyimage.blogspot.com/