Tuesday, February 23, 2010

वो ही एक लम्हा था
जब तुम्हे करीब पाया था
ढूँढ रही हूँ आज तक
उस एहसास का एक कतरा

आँखें क्यों झूठ बोल गयी
या फिर दिखा वही जो  देखना  चाहती थी
इल्म हो रहा है अब
की वो नज़रें मिलाके चुराते क्यों नहीं

दूरी से कोई शिक्वा ही नहीं
क्यूंकि पास वो कभी थे ही नहीं
खता सिर्फ इतनी हुई
कि महक को महबूब समझती रही

Sunday, January 31, 2010

ये रात का नशा है या बात का
या फिर हमारी उस मुलाक़ात का
जब तुम तो थे पर हम नहीं
सारी वो यादें बुनती हुई
कुछ अटक गया था सीने में
कब से खटक रहा था जीने में
जब तुम न थे और हम तनहा कहीं
झ्हल्कियां यूँ ही दिखती हुई
भांगू किधर , तेरी नज़र है
भांगू भी क्यूँ, जब तू ही इधर है
जब तुम होते तो मंजिल होती यहीं
पर अब रस्ता मिला है और ज़िन्दगी नयी

Saturday, October 31, 2009

 dedicated to my friends at NID.....especially to pondy group...

आवारगी है , याराना है
हमारी महफ़िल ही ज़माना है
रौनक तो बसी है बन्दगी में
और चाहा ही क्या जिंदिगी में

क्यूँ मोड़ ऐसा आ गया, जहाँ से कोई " u turn" नहीं
काश हर दम रस्ता भूलें , और हर बार मुलाकात वहीँ

दीवानगी है , पैमाना है
बूँद बूँद का यहाँ ठिकाना है
हसरत इतनी नशा बढ़ता जाए
बरकत होती रहे पर हम न जाएँ

Tuesday, October 6, 2009

कुछ रोकता है तुम्हारे पास जाने से
कोई टोकता है तुम्हारे करीब आने पे
दिवानगी इस हद तक है
छलक न जाए तुम्हारे टकराने से

बोल दूँ गर तो कुछ कम न हो जाए
पी लूँ गर तो नशा बढ़ता ही जाए
आशिकी तो फ़लक तक है
अधर का मज़ा चरस्ता ही जाए

हसीं नजारों में एहसास और गहरा हुआ
आज़ादी की चाहत में दिल पे पहरा हुआ
आवारगी तो सनक तक है
भागूँ ख़ुद से कैसे, वो पल है यूँ ही ठहरा हुआ

Saturday, September 19, 2009

कोई आरज़ू होती
तो ज़िन्दगी जीने जैसी होती

कोई सपने होते
तो नींद में भी हँसी होती

कोई तमन्ना होती
तो दिवानगी भी फितरत होती

शायद कुछ कमीं होती
तो पुरा होने में खुशी होती

Tuesday, September 8, 2009

बात तो हुयी
पर वो बात नहीं थी
दिल में कुछ और था
दिमाग ने कुछ और कही

मौसम तो मस्त था
शायद मुस्कुरा भी रही थी
चाँद छुपन छुपाई खेल गया
और सुट्टे का ख्याल भी नही

सुन भी रही थी
पर क्या सुनना चाहती थी
ध्यान कहीं और था?
या फिर दिल में कोई और........

Thursday, September 3, 2009

एक रात की बात
बस एक जाम के बाद
पास में तन्हाई
और कुछ छल्लों के साथ
तू भी हसीना लगने लगी
आँखों में तेरे भी बिजली दिखी
तारीफ तेरी भी होती मुझसे
नखरे दिखाती तू भी अगर
आदत पड़ी है गुलामी की मुझे
इतनी इज्ज़त से लगता है डर
खुशबू तो फिर भी गुलाब में ही है
क्या हुआ थोड़े से काँटे है अगर