Wednesday, August 19, 2009

क्यूँ नहीं चाहते तुम
की तुम्हे भी कोई याद करे
सूरज की परछाई में
कोई तुमसे भी इकरार करे
देखो कभी पलट कर तुम
कोई नज़रें बेताब दिखाई दे
बिना कुछ बजे ही
धड़कने सुनाई दे
दुःख होता हो शायद उसको
जब दीवानगी कहीं और दिखे
तुम्हारी एक झलक को तरसे
जो तुमपे इतना एतबार करे
यकीन रखो ख़ुद पे तो इतना
तुम्हे ही कोई प्यार करे
तालीम मिली है मुझे
बस यूँ हीं मुस्कुराने की
क्यूँ ढूँढ रहे हैं आप
सिलवटे इन आंखों में

परदा उठता है गिरता है
गूँज भी नहीं इन कानों में
क्यूँ तारीफ करते हैं आप
इन गालिब के शब्दों में

वादा करिए खुदसे न इतना
की कोशिशें भूल जाए आप
ठिकाना बदल के तो देखिये ज़रा
शायद खुदा मिल जाए यूँ हीं राहों में

Tuesday, August 18, 2009

नज़रें है किसी और पे
पर देखे है मुझे
ढूंढे है किसी और को
पर पूछे है मुझे

सोचे है किसी और को
पर सताए है मुझे
चाहे है किसी और को
पर बहकाए है मुझे

पर हो रहा है एहसास
की वो बन गया ख़ास
उसको क्या बताऊँ मैं, की कितना उसे चहुँ मैं
क्यूंकि होना चाहे वो किसी और के पास
फ़र्क पड़ता शायद
पर वो हंस दिए
फिर समझ नही पाये
मेरी उस मुस्कान को

कोशिश की है मैंने
की चाँद न देखूं
काश रोज़ अमावस्या हो
और कोई गलती कर लूँ

गूँज तो थी धड़कन की
पर जाने क्यूँ थम गई
या बढ़ गई पुकार तड़पन की
जो हमे पास से दूर कर गई
क्यूँ झांके और चले गए
दरवाजा तो खुला था
दस्तक तो की भी नही
पर आहट वो कर गए

खटखटाहट कहीं और हुई
पर परछाईं क्यूँ दिखाई दी
नज़रों का धोका है
या फिर शायद, आंखों में बस गए

चाहत तो कभी न थी
पर ये किसका इंतज़ार है
ये हवा का झोंका ही है
जिसको मुझसे प्यार है
बिखरी थी रात उन बाहों में
और चाँद ने ली थी करवट
तारे क्यूँ शर्मा गए
समंदर में कोई नही हलचल

हवाओं की गर्मी में
लिपटी हुई थी आग
पर रौशनी का निशाँ नही
क्या जल रहा था पराग?

गहरा हुआ कहर
चढ़ता हो जैसे ज़हर
डूबे हैं अंगड़ाई में यूँ
शायद पूरा हुआ है सफर
बंधन का एहसास ही नहीं
यूँ हुआ है असर
लड़खड़ा गए तो क्या
थक गए हैं संभल संभलकर

बाहें हो किसी और की
पर हिचक है किसी साथ की
आँखें सूखी और गीले हैं होठ
बात करते हैं आंखों में डूब जाने की

कितनी शिद्दत के बाद कल फिर होगी रात
ख़ास तो कोई बात नही, पर शायद हो कोई बात
कदम बढ़ा लूँ तो तर जाऊँ मैं
और फिर से हो एक आगाज़