बिखरी थी रात उन बाहों में
और चाँद ने ली थी करवट
तारे क्यूँ शर्मा गए
समंदर में कोई नही हलचल
हवाओं की गर्मी में
लिपटी हुई थी आग
पर रौशनी का निशाँ नही
क्या जल रहा था पराग?
गहरा हुआ कहर
चढ़ता हो जैसे ज़हर
डूबे हैं अंगड़ाई में यूँ
शायद पूरा हुआ है सफर
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment